History Of Social Work

समाज कार्य का इतिहस 

इंग्‍लैड़ में समाज कार्य का इतिहास

            प्रत्‍येक समाज एवं प्रत्‍येक युग में दुर्बल, निर्धन, निराश्रयी व्‍यक्ति रहे है। प्रत्‍येक समाज अपने समाज अपने कमजोर सदस्‍यों की किसी न किसी रूप में सहायता में सहायता करता आया है।
            मानव सभ्‍यता के प्रारम्‍भ से ही मनुष्‍य ने पारस्‍परिक रक्षा एवं सहयोग की आवश्‍यकता का अनुभव किया है। संसार के सभी धर्मों ने निर्धनों, निराश्रितों, असमर्थों एवं विकलांगों की सहायता का उपदेश दिया है। प्रत्‍येक एवं विकलांगों की सहायता का उपदेश दिया है। प्रत्‍येक संस्‍कृति में अभावग्रस्‍त दरिद्र एवं निराश्रित व्‍यक्तियोंकी सहायता का प्रबन्‍ध रहा है।
            यदि हम समाज कार्य के इतिहास को देखे तो ज्ञात होगा कि समाजकार्य मानवता का यह रूप है जो निरन्‍तर एक वैज्ञानिक प्रणाली की खोज में रहा है जिसके द्वारा सहायता के कार्य को अधिक से अधिक नियमित और वैज्ञानिक रूप दिया जा सके।
            अन्‍य स्‍थानों के समान योरप में भी समाज कार्य को धार्मिक भावनाओं से ही प्रेरणा मिली और धार्मिक संस्‍थाओं ने प्राचीन समय के धार्मिक नेताओं ने दान वितरण के कार्य को अत्‍याधिक महत्त्व दिया। ऐसी परिस्थिति में धार्मिक भिक्षावृत्ति का अधिक प्रचलन हो जाना स्‍वा‍भाविक था क्‍योंकि भिक्षा द्वारा जीवन निर्वाह करना सरल था और धार्मिक भिक्षावृत्ति आदर की दृष्टिसे देखी जाती थी।
            आदि‍काल से ही धर्म गुरूओं, प्रचारकों तथा अनुयायियों ने दिन दुखियों की सहायता करने का उत्तरदायित्‍व प्रदान किया। इन लोगों ने धार्मिक भावनाओं ईश्‍वर की कृपा प्राप्‍त करने की इच्‍छाने सहायता एवं दान को प्रोत्‍साहन दिया। परस्‍पर सहायता प्रदान करने की भावना का होना ईसाई धर्म में आज्ञा के रूप में माना जाता था। 1520 में जर्मनी में मार्टिन लूथर ने भिक्षावृत्ति को रोकने तथा सभी पैरिसों में दिन दुखियों की सहायता हेतु भोजन, वस्‍त्र इत्‍यादि प्रदान करने के लिए दान पेटी स्‍थापना किए जाने की अपील की ।
            किन्‍तु वैज्ञानिक क्रान्ति के प्रभाव स्‍वरूप मनुष्‍य के मानसिक तथा भौतिक जगत्‍ का विस्‍तार हुआ एवं निर्धन सहायता तथा भौतिक जगत्‍ का विस्‍तार हुआ एवं निर्धन सहायता की यह प्रणाली अधिक काल तक न चल सकी। उत्‍पादन के वैज्ञानिकरण तथा महत्‍वकालीन सामन्‍तवाद के विघटन से हजारों व्‍यक्ति रोजगार की तलाश में घूमने लगे। इस स्थिति का समान करने के लिए इंग्लैण्‍ड में कानून का साहारा लिया गया। 1556 में संसद द्वारा एक अधिनियम पारित हुआ जिसके अनुसार प्रत्‍येक रविवार को गिरजाधरों द्वारा बीमार गरीबों की सहायता के लिए धन का संग्रह किया जाने लगा। इसके साथ-साथ स्‍वस्‍थ व्‍यक्तियों के लिए भीख माँगना वर्जित कर दिया गया। 1547 में पारित एक अधिनियम के अनुसार स्‍वस्‍थ भिखमंगों के शरीर में V चिन्‍ह गुदवाने की व्‍यवस्‍था कर दी गई। परंतु इस प्रकार के अधिनियम समस्‍या को हल करने के बजाय समस्‍या को दबाने के दृष्टिगत से पारित हुए थे।
            1576 में सुधारगृह (House of Correction)  स्‍थापित किए गए जिनमें पटसन, पटुआ लोहा एकत्रित किया जाता था एवं स्‍वस्‍थ शरीर वाले निर्धनों, विशेष रूप से युवकों को कार्य करने के लिए बाध्‍य किया जाता था । निर्धनों के लिए 1601 में एलिजाबेथ का निर्धन कानून (Elizabethan  Poor Law) बनाया गया जिसे “43-A एलिजाबेथ के नाम से जाना जाता हैा इस कानून के प्रमुख प्रावधान निम्‍नलिखित हैं-
1.      किसी भी ऐसे व्‍यक्ति का पंजीकरण न किया जाए जिसके सम्‍बंधी, पति अथवा पत्‍नी, पिता अथवा पुत्र सहायता कर सकने की स्थिति में हों।
2.      निर्धन कानून के अन्‍तर्गत 3 प्रकार के निर्धनों को सहायता प्रदान करने की व्‍यवस्‍था की गयी।
                                I.            स्‍वस्‍थ शरीर वाले निर्धन।
                             II.            शक्तिहीन निर्धन ।
                           III.            आश्रित बच्‍चे।
3.      यदि बच्‍चे अपने निर्धन माता-पिता या सम्‍बंधियों के साथ रह सकें तो उन्‍हें उत्‍पादन के लिए आवश्‍यक ऐसी वस्‍तुएँ प्रदान की जाएँ जिनसे वे घेरलू उद्योग गृहों में रखा जाए।
4.      निर्धन सहायता हेतु वित्तीय व्‍यवस्‍था करने के लिए निर्धन कर लगाकर एक कोष स्‍थापित किया गया था जिसमें निजी दान, कानून का उल्‍लंघन करने  पर किए गए जुर्माने इत्‍यादि से प्राप्‍त धनराशि जमा की जाती थी।
5.      निर्धनों के ओवरसियर इस निर्धन कानून को लागू करने एवं उसका प्रशासन सम्‍बंधी कार्य करते थे। इनकी नियुक्ति शान्ति के न्‍यायाधीस या मैजिस्‍ट्रेट द्वारा की जाती थी। इन अधिकारियों का कार्य निर्धनों से सहायता के लिए प्रार्थना पत्र लेना उनकी सामाजिक दशाओं का पता लगाना एवं किस प्रकार की सहायता दी जाए इससे सम्‍बंधित सभी निर्णय लेना था।
- इस प्रकार 1601 का यह निर्धन कानून इंग्‍लैड़ में 300 वर्षों तक जान सहायता के क्षेत्र में अपेक्षित मानदण्‍ड निर्धारित करते हुए निर्धनों को सहायता प्रदान करने में महत्‍वपूर्ण्‍ भूमिका निभाता रहा।
- इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया कि अपने क्षेत्रके निर्धनों की सहायता का उत्तरदायित्‍व स्‍थानीय समुदाय पर होना चाहिए  । किसी भी एक स्‍थान पर अन्‍य स्‍थानों से आकर निर्धन जमा न हों इसके लिए 1662 में the Law of Settlement पारित किया गया।  
- 1982 में Work Houses Act के बन जाने के बाद ब्रिस्‍ट्रल तथा अन्‍य शहरों में कार्य गृहों की स्‍थापना की गयी। जिनमें वहाँ निर्धन प्रौढ़ो एवं बच्‍चे को कताई-बुनाई इत्‍यादि के प्रशिक्षण अवसर प्रदान किए गए।
- इन संस्‍तुतियों के आधार पर 1834 में नया निर्धन कानून बनाया गया। इससे पहले सहायता की विरोधता कंगाली में वृद्धि एवं निर्धन कर के बोझ के कारण 1832 में एक आयोग संगठित किया गया जिसने दो वर्षों तक निर्धन कानून के प्रशासन का एक विस्‍तृत सर्वेक्षण करके 6 मुख्‍य सिफारिशें की –
A.    आंशिक दान की समाप्ति।
B.     सभी स्‍वस्‍थ शरीर सहायता प्रार्थियों को कार्य गृहों में रखा जाना।
C.     बीमार, अपंग एवं छोटे बच्‍चों वाली विधवाओं के लिए outdoor relief प्रदान करना ।
D.    गाँवों के सहायता कार्यों को मिलाकर poor law union में पुन: संगठित करना।
E.     निर्धन सहायता पाने वालों की दशाओं को समुदाय में कार्य करने वाले व्‍यक्तियों की दशाओं से कम आ‍कर्षित बनाना। (Principle of less eligibility)
F.      नियंत्रण के लिए एक केन्‍द्रीय मण्‍डल की स्‍थापना।
- अन्‍तत: इन सिफारिशों के आधार पर एक नया कानून बनाया गया जो एक सौ साल तक चलता रहा। यह कानून The New Poor Law के नाम से जाना जाता है। इस कानून के आधार पर निर्धन सहायता व्‍यय को ½ कम कर दिया। 200 कार्य गृह स्‍थापित किए गए एवं पुराने गृहों में सुधार किया गया। निर्धनों के पूरे परिवारों को इन कार्य गृहों में रखा गया। सभी प्रकार के व्‍यक्तियों को एक ही संस्‍था में रखा जाने लगा। अनुशासन का कठोरता से पालन होने लगा जिससे इन गृहों की लोकप्रियता समाप्‍त हो गई।
- The Poor Law Commission of 1905
            बीसवीं शताब्‍दी के आरम्‍भ में इंग्‍लैड़ में बेरोजगारी बहुत बढ़ गई। मुख्‍य रूप से कोयला खानों के श्रमिकों एवं उनके परिवारों ने निर्धन सहायता माँगना आरम्‍भ कर दिया। अत: 1905 में लार्ड जार्ज हेमिल्‍टन की अध्‍यक्षता में निर्धन कानून एवं दु:ख निवारण शाही आयोग (Royal Commission on Poor Law and Relief of Distress) का गठ़न किया गया। इस आयोग ने 4 सिफारिशें की –
 A.    The Poor Law एवं संरक्षकों के मण्‍डल के स्‍थान पर काउण्‍ट्री कौन्सिल स्‍थापित की जाए जिससे स्‍थानीय प्रशासन को ¾ तक कम किया जा सके।
 B.     निर्धन सहायता के दण्‍डात्‍मक पक्ष को समाप्‍त करके उसके स्‍थान पर मानवीय जन सहायक कार्यक्रम का दुष्टिकोन रखा जाए ।
 C.     मिश्रित भिक्षा गृह समाप्‍त कर दिया जाए। मानसिक रोगियों का चिकित्‍सालयों में उपचार किया जाए एवं बच्‍चों को पालन-गृहों या आवासीय विद्यालयों में रखा जाए।
 D.    वृद्धोंके लिए राष्‍ट्रीय पेंशन, निर्धनों के लिए चिकित्‍सालयों में नि:शुल्‍क उपचार सार्वजनिक रोजगार की सेवाएँ एवं बेरोजगारी एवं अशक्‍तता की सुविधाओं के साथ सामाजिक बीमा का एक कार्यक्रम आरम्‍भ किया जाए।
इंग्लैण्‍ड में आधुनिक सामाजिक सुरक्षा
            द्वितीय विश्‍व युद्ध के बाद कल्‍याण क्षेत्र में कई नए कानून  पारित हुए-
1.      बेवरिज रिपोर्ट
1941 में इंग्‍लैण्‍ड ने अपने सम्‍पूर्ण समाज कल्‍याणकारी कार्यक्रमों में सुधार करना प्रारंभ किया एवं लार्ड विलियम बेवरिज की अध्‍यक्षता में  एक सामाजिक बीमा एवं सम्‍बन्धित सेवाओं पर अन्‍तर्विभागीय आयोग (inter-departmental Commission on Social Insurance and Allied Services) गठित किया। इस आयोग की रिपोर्ट में 5 कार्यक्रमों पर आधारित सामाजिक सुरक्षाकी एक व्यापक योजना प्रस्‍तुत की गयी।
A.    सामाजिक बीमा ।
B.     जन सहायता।
C.     बच्‍चों के भत्‍ते।
D.    व्‍यापक नि:शुल्‍क स्‍वास्‍थ्‍य एवं पुनर्वास सेवाएँ एवं
E.     पूर्ण रोजगार का अनुरक्षण।
इस आयोग का कहना है कि – आवश्‍यकता के साथ-साथ चार और दानव-
                                                        I.            बीमारी (Disease)
                                                     II.            अज्ञानता (Ignorance)
                                                   III.            मलीनता (Squalor)
                                                  IV.            निष्क्रियता (Idleness) भी मानव कल्‍याण में बाधा डालते है।
- इस रिपोर्ट के आधार पर 1944 में अपंग व्‍यक्ति कानून (Disabled Persons Act) बना जिसके अधीन वाणिज्‍य तथा औद्योगिक प्रतिष्‍ठानों के लिए यह आवश्‍यक कर दिया गया कि वे अंपगों को रोजगार दे।
- 1944 में ही पेंशन एवं राष्‍ट्रीय बीमा मंत्रालय का गठन किया गया एवं इसके अधीन एक राष्‍ट्रीय सहायता परिषद बनायी गयीजो सहायता प्रदान करने के लिए उत्‍तरदायी थी।
- 1945  में परिवार भत्‍ता कानून पास किया गया।
- 1948 में राष्‍ट्रीय बीमा कानून बनाया गया जिसके अधीन स्‍वास्‍थ्‍य अपंगता एवं वृद्धावस्‍था बीमा इत्‍यादि योजनाएँ बनायी गयी। इस प्रकार –
            सामाजिक सुरक्षा के सभी अधिनियमों में समय-समय पर संशोधन करके सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों में कई बार उचित परिवर्तन किए गए है। Social Security Benefit Act 1975 ने इंग्‍लैड़ की जनता के लिए एक व्‍यापक सामाजिक सुरक्षा का कार्यक्रम निर्मित किया है।
            वर्तमान समय में राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य सेवा, समाज सेवाएँ तथा सामाजिक सुरक्षा इंग्‍लैड में पाई जाने वाली समाज कल्‍याण व्‍यवस्‍था के प्रमुख अंग है। राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य सेवा के अंतर्गत सभी नागरिकों को उनकी आय पर ध्‍यान दिए बिना व्‍यापक रूप से चिकित्‍सकीय सेवायें प्रदान की जा रही है। सामाजिक सुरक्षा व्‍यवस्‍था वित्तिय आवश्‍यकता रखने वाले व्‍यक्तियों को एक मूलभूत जीवन स्‍तर का आश्‍वासन प्रदान करती हैं एवं इसके लिए इस व्‍यवस्‍था के अधीन रोजी-रोटी कमाने में असमर्थता की अवधि में आय प्रदान की जाती है तथा परिवारों को सहायता दी जाती है एवं असमर्थता के कारण होने वाले अतिरिक्‍त व्‍यय वहन करने के लिए सहायता प्रदान की जाती है।
            राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य सेवा का दायित्‍व केन्‍द्र सरकार द्वारा  प्रत्‍यक्ष रूप से ग्रहण किया जाता है। यह सहायता इसके एजेण्‍टों के रूप में कार्य करने वाले स्‍वास्‍थ्‍य प्राधिकरणों एवं बोर्डो द्वारा दी जाती है। केन्‍द्र सरकार सामाजिक सुरक्षाके लिए भी प्रत्‍यक्ष रूप से उत्‍तरदायी है।
इंग्‍लैण्‍ड में दान संगठन समिति   
          19 वीं शताब्‍दी में निर्धन सहायता एवं सामाजिक दर्शन को प्रभावित करने की दृष्टि से दान संगठन समिति की विशेष भूमिका है। इंग्‍लैड में 1834 से पूर्व निर्धन सहायता पर काफी व्‍यय किया जाता था। देश के परोपकारी व्‍यक्ति मिश्रित भिक्षा गृहों की क्रूरता एवं हीनता से अपने जानने वाले एवं अन्‍य व्‍यक्तियों, बच्‍चों और अपंगों को बचाने के लिए प्रयाग करने लगे।
            थामन्‍स चामर्स (Thomas Chalmers) के विचारों में व्‍यक्ति के पुनवास के लिए उसमें आत्‍म–निर्भरता लाना आवश्‍यक है। इन सहायता समितियाँ के अनुसार निर्धन का कारण उसका व्‍यक्तिगत दोष माना जाता था यही विचार निर्धन सहायता अधिकारियों का था। इस परिस्थिति में सुधार लाने की दृष्टि से 1869 में लंडन में Society for Organizing Charitable Relief and Repressing Mentality की स्‍थापना की गयी। कालान्‍तर में इसका नाम C. O. S.  (Chalmers Organizing Society) कर दिया गया। इस समिति के सिद्धान्‍त थामस चामर्स के विचारों पर आधारित थे। इनका विचार था कि व्‍यक्ति के पुनर्वास के लिए उसे आत्‍मनिर्भर बनाना आवश्‍यक है। इस Society ने चामर्स के इन विचारों को मान लिया कि – व्‍यक्ति अपनी निर्धनता के लिए उत्तरदायी है एवं सहायता प्राप्‍त करना उसके आत्‍म सम्मान को नष्‍ट करता है एवं उसे भिक्षा पर रहने पर विवश करता है। Society ने यह भी माना कि- निर्धन को अपना भरण पोषण अपनी योग्यताओं को प्रयोग करके,करने के लिए जाना चाहिए।
            उस समय की दान पद्धतिके एक महान आलोचक थामस चालर्स (1780-1847) थे। उनकी विचार था कि प्रचलित सार्वजनिक एवं चर्च की दान-पद्धति निरर्थक है। उससे निर्धन व्‍यक्ति अनैतिक हो जाते हैं और उनकी आत्‍मावलम्‍बन की इच्‍छा नष्‍ट हो जाती है। उनका विचार था कि इस प्रकार का दान निर्धनो के सम्‍बन्धियों मित्रों तथा पड़ोसियों की सहायता करने की इच्‍छा को नष्‍ट कर देता है और इससे परोपकारी व्‍यक्तियों की सहायता करने की उत्‍सूकता का प्रयोग नही हो पाता।

उन्‍होंने निम्‍नलिखित प्रक्रम का सुझाव दिया-
                                I.            दरिद्रता की प्रत्‍येक घटना की सावधानी से जाँच की जाय, यह ज्ञात किया जाय कि, निराश्रिता का क्‍या कारण है और निर्धनों को आत्‍मावम्‍बन की संभावना को विकसित किया जाय।
                             II.            यदि स्‍वावलंबन सभव न हो तो सम्‍बन्धियों, मित्रों तथा पड़ोसियों को उत्‍साहित किया जाय कि वे अनाथों, वृद्धों, रोगियो तथा असमर्थों को आश्रय दें।
                           III.            यदि परिवार की आवश्‍यकताएँ इस प्रकार पूरी न हो तो कुछ ऐसे धनी नागरिक ढूढें जाएँ जो उनका भरण-पोषण कर सकें।
                          IV.            यदि इनमें से कोई उपाय सफल न हो तभी जिले का डीकन अपनी धार्मिक परिषद से सहायता की प्रार्थना करे।
चामर्स की वैयक्तिक एवं पादरी प्रादेशिक दान की अवधारणा दान के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण योगदान थी। उन्‍होंने  प्रत्‍येक घटना में वैयक्तिक आधार पर जाँच करने और दरिद्रता के कारणों को ज्ञात करने का प्रयत्‍न करने के सिद्धान्‍त को विकसित किया। उनके विचार में निर्धनता का कारण व्यक्ति की अज्ञानता एवं दूरदर्शिता का अभाव था। उन्‍होंने अन्‍य सामाजिक तथा आर्थिक कारणों की अवहेलना की जो व्‍यक्ति की शक्ति से बाहर होते हैं। फिर भी उनकी यह धारणा कि निराश्रितों के कल्‍याण पर वैयक्तित रूप से ध्‍यान देना चाहिये सहायता के कार्य की उन्‍नति में सहायक हुई। चामर्स के देहान्‍त के पश्‍चात्‍ कुछ समय तक उनकी योजना कार्यान्वित न हो सकी परन्‍तु 1809 में लन्‍दन चैरिटी आर्गनाईजेशन सोसायटी उन्‍हीं के विचारों के आधार पर स्‍थापित हुई।
            दान संगठन समिति ने C. O. S.   इन विचारों को व्‍यावहारिक रूप दिया। समिति ने एक पूछताछ विभाग खोला जो निर्धन कानून अधिकारियों तथा दान देने वाले परोपकारी व्‍यक्तियों से सम्‍पर्क करता था। अन्‍तत: बहुत से ऐसे व्‍यक्तियों का पता चला जिन्‍होंने भिक्षावृत्ति को व्‍यवसायके रूप में अपनाया  था एवं अनेक संस्‍थाओं से सहायता प्रदान करते थे।
            इस समिति में लंदन को अ‍नेक क्षेत्रों में विभाजित किया। प्रत्‍येक क्षेत्र में सहायता कार्य के लिए स्‍वयं सेवक के समूह बनाए। ये स्‍वयं सेवक क्षेत्र के जरूरतमंद व्‍यक्तियों को धन वस्‍त्र एवं खाद्यान्‍नों के रूप में  सहायता देते थे। साथ-साथ उन्‍हें आत्‍मनिर्भर होने एवं जीवन धारा को बदलने के लिए प्रेरित करते थे।
            समिति ने सरकारी निर्धन सहायता का विरोध किया। इसने गैर सरकारी प्रयासों का प्रोत्‍साहन दिया। 1869 में स्‍थापित इस सोसायटी की भाँति इंग्‍लैड एवं स्‍काटलैण्‍ड के अन्‍य नगरों में भी इस प्रकार की समितियों संगठित की गयी एवं कालान्‍तर में यह आंदोलन U.  S. A. में भी फैल गया।   

अमेरिका में समाज कार्य का इतिहास

            अमेरिका में समाज कार्य के विकास का इतिहास इंग्‍लैड जैसा ही था। 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों तक समाज कार्य का विकास वैसा ही रहा परन्‍तु इसके बाद 1935 तक समाज कार्य के क्रियाकलायों मे थोड़े बहुत परिवर्तन देखने में आते हैं। अमेरिका के निवासी मुक्‍त उद्यम पद्धति में विश्‍वास रखते थे इसलिए किसी भी प्रयास को जो इस सिद्धान्‍त से मेल नहीं खाता नहीं मानते थे।
            सत्रहवीं शताब्‍दी को आरम्‍भ से यूरोप में व्‍यक्तियों की एक बड़ी संस्‍था ने अमेरिका में प्रवेश क्रिया और वहाँ एक नवीन बस्‍ती संस्‍था की स्‍थापना की। अमेरिका की प्राचीन बस्तियों की संस्‍कृति यूरोप की प्राचीन सभ्‍यता और संस्‍कृति पर आधारित थी। यहाँ के राजनैतिक स्‍वरूपों आर्थिक, क्रियाओं, सामाजिक प्रथाओं रूढि़यों और धार्मिक दृष्टिकोण के निर्माण में यूरोप की परिस्थिति का महत्‍वपूर्ण स्‍थान हैं।
            समाज कार्य के क्षेत्र में भी उपयोग की बस्तियों ने यूरोप और विशेषकर इंग्‍लैड का अनुसरण किया। अमेरिका के ऐच्छिक एवं राजकीय समाजकार्य का आधार बहुत कुछ उन विचारों  एवं व्‍यवहारों पर है जिनका जन्‍म और विकास इंग्‍लैड में हुआ।
            समाज कल्‍याण पर इग्लैड का प्रमुख प्रभाव यह पड़ा कि इंग्‍लैण्‍ड के समान अमेरिका में भी ऐच्छिक दान (प्राइवेट चैरिटी) पर बल दिया जाने लगा। आरम्भ में अमेरिका में भी राज्‍य का कार्य केवल संरक्षण करना ही समझा जाता था।
  ऐच्छिक  दान
            इंग्‍लैण्‍ड एवं अमेरिका के निर्धन सहायता कार्यों में अनेक प्रकार की भिन्‍नताएँ मिलती है। इंग्लैण्‍ड में निर्धन सहायता की पद्धति के अन्‍तर्गत निर्धनों को poor houses Work Houses में रखा जाता था जबकि अमेरिका में कुछ बड़े नगरों में ही कुछ भिक्षा गृह एवं सुधार गृह थे । अमेरिका में पहला भिक्षा गृह 1657 में न्‍यूयार्क में खोला गया एवं कालान्‍तर में अन्‍य नगरों में खोले गए ।
            इंग्‍लैण्‍ड में व्‍यक्तिगत दान की सहायता से निर्धनों की सहायता चिकित्‍सालयों आदि के माध्‍यम से की जाती थी । अमेरिका में व्‍यक्तिगत दान का स्‍थान बहुत कम था जो था भी वह 18वीं शदाब्‍दी के अंत तक समाप्‍त हो गया ।
            एक अन्‍य प्रकार की गैर सरकारी चैरिटी भी थी जो राष्‍ट्रीयता पर आधारित थी । इस प्रकार की पहली सहायता समिति बोस्‍टन नगर में संगठित की गई । इस प्रकार इन चैरिटी आर्गेनाइजेशन सोसाइटीज ने इन दशाओं को ठीक करने के लिए कार्य किया ।
            निर्धनों की समस्‍याओं को ठीक से समझने के लिए 1898 में न्‍यूयार्क नगर में पहला समाज कार्य पाठ्यक्रम, संगठित किया गया । सभी गैर सरकारी संस्‍थाओं के कार्य को ठीक से संगठित एवं उनके संचालन के लिए Council of Social Agencies की स्‍थापना की गई । कार्य को अच्‍छी तरह से चलाने के लिए संयुक्‍त प्रयास द्वारा धन इकट्ठे करके Community chest की स्‍थापना की गई ।
            The Settlement House Movement इस समय का एक और महत्त्वपूर्ण विकास है । इसका उद्देश्‍य गन्‍दी एवं भीड़ भाड़ वाले इलाके से हटाकर  Settlement House में रखना था । Settlement House में रहने वाले समाज-सुधारक बन गए एवं गन्‍दी बस्तियों की सफाई. बाल अपराधियों के लिए विशेष बाल न्‍यायालय आवासीय विधान एवं बीमारियों की रोकथाम के लिए माँग रखी गई ।
भिक्षा गृह
          20वीं शताब्‍दी के आरम्‍भ में निर्धनों पर बढ़ते हुए व्‍यय की आलोचना होने लगी । स्‍थानीय सरकारों पर निर्धन सहायता के बढ़ते हुए व्‍यय का कारण जनसंरक्षण में वृद्धि से निर्धनों की संख्‍या का बढ़ जाना एवं फसल की असफलता के कारण बहुत से स्‍वस्‍थ शरीर श्रमिकों का निर्धन सहायता माँगना था । इस प्रकार कई परिवार सरकारी सहायता पर आश्रित होने लगे । इन्‍हीं कारणों से 1821 एवं 1823 में अमेरिका के दो राज्‍यों Massachusetts  (मेसाचुसेट्स) एवं Newyork (न्‍यूयार्क) में समितियाँ बनाई गयीं । समिति के अनुसार वाह्य कक्ष अधिक खर्चीली एवं निर्धनों की नैतिकता को नष्‍ट करती है । भिक्षा गृह एवं कारागृह इस समिति ने स्‍थापित किए ।
आवश्‍यकताग्रस्‍त लोगों के साथ काम करने एवं रहने का काल
            आरंभिक काल में अमेरिका आने वाले अप्रवासियों की स्थिति सोचनीय थी । ये अप्रवासी विभिन्‍न वंशों एवं पृष्‍ठभूमियां के थे एवं भाषाएँ भिन्‍न-भिन्‍न बोलते थे । इसमें पारस्‍परिक मेल-जोल नगण्‍य था । पारस्‍परिक मेल-जोल बढ़ाने के लिए चार्ल्‍स बी.स्‍टोवर ने नेबरहुड गिल्‍ड ऑफ न्‍यूयार्क सिटी की 1887 में स्‍थापना की, जिसे आज यूनिवर्सिटी सेटिलमेंट हाउस के नाम से जाना जाता है ।
            कालान्‍तर 1889 में जेन ऐडम्‍स के संरक्षण में हाल्‍स्‍टेड स्‍ट्रीट में एक हल हाउस की स्‍थापना की ।
कल्‍याण सेवाओं का संगठन
          अमेरिका में समाज कार्य के प्रसार की दृष्टि से 1917 से लेकर 1920 की अवधि महत्त्वपूर्ण है । इस समय विभिन्‍न राज्‍यों द्वारा कल्‍याण सेवाओं के संगठनों का एक राज्‍यव्‍यापी प्रणाली के रूप में समन्‍वय करने के प्रयास किए गए एवं अंतत: राज्‍यों में गवर्नर द्वारा कल्‍याण विभागों तथा सलाहकार बोर्डो की नियुक्ति की गई । कुछ राज्‍यों में बोर्ड की स्‍थापना की गई जिसका कार्य कला कल्‍याण कार्यों के संगठन के लिए प्रशासक का चुनाव करना होता था ।
संघीय सहायता एवं अनुदान
            जन कल्‍याण के संघीय कार्यक्रमों को प्रभावित करने में, संघीय सहायता तथा अनुदान का प्रसार एक मुख्‍य कारण है । यह अनुदान प्रारम्‍भ में राज्‍यों को भूमि के रूप में दी जाती थी । भूमि बिक्री से जो धन प्राप्‍त होता था उसे संघीय कार्यक्रमों में व्‍यय किया जाता था । ये कार्यक्रम विकलांग बच्‍चों के व्‍यवस्‍थापन, लड़कियों की शिक्षा तथा असमर्थ व्‍यक्तियों की सहायता से सम्‍बंधित थे: परन्‍तु बाद में यह अनुदान धनराशि के रूप में दिया जाने लगा । 1920 के बाद संघीय सरकार द्वारा अनुदान प्राप्‍त जन-कल्‍याण के कार्यों की संख्‍या को बढ़ा दिया गया ।
1929 के उपरान्‍त जनकल्‍याण
          समाज कल्‍याण के क्षेत्र में 1900 के बाद से ही दो नई प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं ।
            (A) सरकारी एवं गैर सरकारी दोनों ही स्‍तरों पर समाज कल्‍याण की समस्‍याओं को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर समझने की आवश्‍यकता को पहचाना गया ।
            (B) समाज कल्‍याण सेवाओं को प्रदान करने के लिए केन्‍द्रीय सरकार को राज्‍यों द्वारा दी जा रही सेवाओं के अनुपूरक के रूप में कार्य करना या कुछ विशेष समूहों को प्रत्‍यक्ष रूप में केन्‍द्रीय सरकार द्वारा सेवा प्रदान करना ।
            परन्‍तु यह भागीदारी 1930 तक आंशिक रूप से देखने को आती है ।राष्‍ट्रीय स्‍तर के संगठनों का नेतृत्‍व गैर सरकारी कल्‍याण संगठनों के हाथ में था । ये संगठन थे –

1. 1904 की National Child Labor  Committee.
2. 1899 की National Consumers League.
3. 1876 की American Association on Mental Deficiency.
4. 1895 की National Society for the Study of Education.
    आदि ।
सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 1935
(Social Security Act, 1935)
          बेरोजगारी, बीमारी, असमर्थता, मातृत्‍व तथा बाल-समास्‍याओं के समाधान के लिए एक स्‍थायी व्‍यवस्‍था का होना आवश्‍यक था । परिणामस्‍वरूप 14 अगस्‍त 1935 में सामाजिक सुरक्षा अधिनियम पारित किया गया । इसके अन्‍तर्गत सामाजिक बीमा, सामाजिक सहायता, स्‍वास्‍थ्‍य, महिला तथा बाल कल्‍याण के लिए व्‍यवस्‍था की गयी ।
            सामाजिक सुरक्षा की योजनाओंके अनुसार वृद्धावस्‍था, अवकाश प्राप्‍त 65 वर्ष की आयु के बाद काम से अवकाश ग्रहण करने पर प्रदान किया जाता है । इसके अतिरिक्‍त यदि पत्‍नी तथा पति की आयु 62 वर्ष से अधिक होती है तो 18 वर्ष से कम आयु के बच्‍चों को भी यह लाभ दिया जाता है।
            बेरोजगारी, चिकित्‍सा की समस्‍या को हल करने के लिए विभिन्‍न प्रकार की सुविधाओं की व्‍यवस्‍था की है । इस प्रकार अमेरिका में प्रत्‍येक नागरिक को विपत्ति के समय सहायता प्राप्‍त करने की पूर्ण व्‍यवस्‍था है ।
कतिपय अन्‍य समाज कार्य के विकास
A.    Civil Conservation Corps (C 3)
1933 में यह कानून पारित किया गया । इस कानून के अन्‍तर्गत 17 एवं 25 वर्ष की आयु वाले युवकों को जिन्‍हें नौकरी की आवश्‍यकता हो एवं जो स्‍कूल न जा रहा हो उसे C 3 शिविरों में भर्ती होने की सुविधा दी जाने लगी । इसके अतिरिक्‍त भूतपूर्व अवकाश प्राप्‍त सैनिक एवं Red Indians इन शिविरों में भर्ती हो सकते थे । इन शिविरवासियों को मासिक वेतन दिया जाता था जिसका कुछ अंश उनके परिवारों को भेज दिया जाता था । 1942 में इसे भी समाप्‍त कर दिया गया ।

B.     National Youth Administration
यह एक दूसरा कार्यक्रम था जिसे 1935 में दो उद्देश्‍यों को सामने रखकर चलाया गया था ।
        I.            अपनी शिक्षा को चालू रखने के लिए, आर्थिक सहायता देकर, Part-time नौकरी देकर । सहायतार्थी स्‍कूल, कालेज एवं स्‍नातक छात्रों की सहायता ।
     II.            18-25 वर्ष के बेरोजगार युवकों को अनुभव देने के लिए परियोजनाओं के कार्यों पर अंशकालिक नौकरी देकर सहायता । 1945 तक यह समाप्‍त कर दिया गया ।
C.     Program for Rural Rehabilitation
अमेरिका में आर्थिक मंदी आने से ग्रामीण स्थिति बिगड़ गई । राज्‍य सरकार को केन्‍द्रीय अनुदान लम्‍बी अवधि के लिए मिलने लगे एवं नए अधिनियम के प्रशासन के लिए – Federal Emergency Relief Administration (FERA) स्‍थापित किया गया । इसी Fera ने ग्रामीणों की सहायता की ।
अन्‍तत: अमेरिका में समाज़ कार्य सदैव सामाजिक एवं आर्थिक व्‍यवस्‍था के परिवर्तनों से प्रभावित होता रहा है । यहाँ प्राचीन सामन्‍तवादी समाज पद्धतिके विघटन से लेकर, औद्योगिक समाज व्‍यवस्‍था की स्‍थापना तक, व्‍यक्ति के समक्ष किसी न किसी प्रकार के अभाव उपस्थित रहे हैं । इन आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए समाज द्वारा समय-समय पर विभिन्‍न प्रकार की व्‍यवस्‍था की गई । इस प्रकार समाज कार्य, अन्‍ततोगत्‍वा, राष्‍ट्रीय अर्थतंत्र का एक अत्‍यन्‍त आवश्‍यक अंग बन गया । उद्योग तथा नवीन व्‍यवसायों का ज्‍यों-ज्‍यों विकास हो रहा है त्‍यों-त्‍यों समाज सेवकों के कार्य क्षेत्र का भी प्रसार हो रहा है ।
इस प्रकार स्‍पष्‍ट है कि अमेरिका में समाज कार्य का विकास निजी तथा ऐच्छिक सेवा संस्‍थाओं के प्रयत्‍नों के फलस्‍वरूप हुआ । कालान्‍तर में इस कार्य को राज्‍य ने अपनी कल्‍याणकारी नीति का प्रमुख अंग बना लिया ।

भारत में समाज कार्य का इतिहास

            भारतीय समाज एक परम्‍परागत समाज रहा है । भारतीय समाज अति प्राचीनकाल में एक प्रकार का साम्‍यवादी समाज था जिसमें निजी सम्‍पत्ति का जन्‍म अभी नहीं हुआ था । निजी सम्‍पत्ति के जन्‍म के साथ राजा का भी जन्‍म हुआ एवं युद्ध से जीती गई सम्‍पत्ति  विजेता की हो गई जिसे वितरित करना उसकी अपनी इच्‍छा पर था । पीडि़तों की सहायता करना प्राचीनकाल से भारत की परम्‍परा रही है । मजूमदार के अनुसार राजा, व्‍यापारी, जमींदार तथ अन्‍य सहायता संगठन धर्म के पवित्र कार्य को सम्‍पन्‍न करने के लिए एक दूसरे की सहायता करने में आगे बढ़ने का प्रयत्‍न करते थे ।
            हडप्‍पा संस्‍कृति से लेकर बौद्ध काल तक जनता की भलाई के लिए उपदेश दिए जाते थे ।बुद्ध अपने जीवन काल में काफी लोगों को उपदेश दिया करते थे । मौर्यकाल में भी जनता की भलाई के लिए उपदेश दिए गए । अशोक ने भी कहा कि सहायता के लिए मेरी प्रजा किसी भी समय मुझसे मिल सकती है चाहे मैं अन्‍त:पुर में ही क्‍यों न रहूँ । गुप्‍तकाल एवं हर्ष के काल में भी इसी प्रकार की व्‍यवस्‍थाएँ देखने को मिलती हैं ।
            भारत में जब मुसलमान आये तो उन्‍होंने भी अपने धर्म के आदेशानुसार दान-पुण्‍य पर अधिक धन व्‍यय किया । इस्‍लाम में ज़कात एक महत्‍वपूर्ण तत्त्व है जिसके अनुसार प्रत्‍येक व्‍यक्ति को प्रतिवर्ष अपनी सम्‍पत्ति, विशेष प्रकार से धन या स्‍वर्ण, का ढाई प्रतिशत भाग ज़कात के रूप में व्‍यय करना आवश्‍यक है ज़कात की रकम निर्धन एवं अभावग्रस्‍त व्‍यक्तियों पर व्‍यय की जाती है । इसके अतिरिक्‍त इस्‍लाम में एक संस्‍था खैरात की भी है जिसके अनुसार अभावग्रस्‍त व्‍यक्तियों की आर्थिक सहायता व्‍यक्तिगत रूप से की जाती है । इसके लिये कोई दर निश्चित नहीं है और यह इच्‍छानुसार दी जाती है । इस्‍लाम में धन के प्रति घृणा का प्रचार किया गया है और अधिक से अधिक धन को अभावग्रस्‍त व्‍यक्तियों में वितरित करने पर बल दिया गया है ।
            दिल्‍ली के सुल्‍तानों ने अपने धर्म के सिद्धांन्‍तों के अनुसार, जो दान पर अधिक बल देता है, निर्धनों एवं अभावग्रस्‍त व्‍यक्तियों पर अधिक धन व्‍यय किया । ज़कात द्वारा प्राप्‍त धन के अतिरिक्‍त, जो वैधानिक रूप से दान-सम्‍बन्‍धी कार्यों के लिए निर्दिष्‍ट होता था, अन्‍य साधनों से प्राप्‍त बड़ी-बड़ी धनराशियाँ निर्धनों पर व्‍यय की जाती थीं – इस सम्‍बन्‍ध में शेरशाह का एक विश्‍वसनीय शिष्‍ट मनुष्‍य ख़वास खां बहुत प्रसिद्ध है । हजारों नर नारी उसके बनवाए घरों और खेमों में रहते थे और वह स्‍वयं उनके लिए भोजन परसता था । हिन्‍दुओं को कच्‍चा भोजन मिलता था – महमूद गवान जो एक राज्‍य का मालिक था अपना सारा धन निर्धनों पर व्‍यय कर देता था और स्‍वयं कृषकों वाला साधारण भोजन लेता था और चटाई बिछाकर जमीनपर सोता था । ख़ानकाहें भी निर्धन सहायता का केन्‍द्र थीं क्‍योंकि वहाँ भोजन नि:शुल्‍क मिलता था और अभावग्रस्‍तों एवं यात्रियों के ठहरने का स्‍थान मिलता था । राज्‍य की ओर से या निजी व्‍यक्तियों की ओर से जो धन उन्‍हें मिलता था उसका एक बड़ा भाग शिक्षा, समाज सेवा, एवं निर्धन सहायता पर व्‍यय होता था । यह दान पुण्‍य इतना विस्‍तृत था कि इसके कारण व्‍यावसायिक भिक्षुकों का एक वर्ग उत्‍पन्‍न हो गया -   इब्‍ने बूतता ने एक विभाग के विषय में लिखा है जिसमें अभावग्रस्‍त पुरूषों एवं स्त्रियों की सूची रखी जाती थी और उन्‍हें अनाज दिया जाता था । विद्वानों को निरीक्षक नियुक्‍त किया जाता था ताकि तटस्‍थ रूप से कार्य हो सके । फिरोजशाह ने अपने कोतवाल को आदेश दे रखा था कि वह वृत्तिहीनों को उसके सामने प्रस्‍तुत करे- वे उसके सामने प्रस्‍तुत किये जाते थे और उनके लिए रोजगार उपलब्‍ध करता था । इस बात में वह सुल्‍तान गयासुद्दीन तुगलक का अनुसरण करता था जिसके अनुसार अपराध अभाव का परिणाम था । अत: वह निर्धनों के लिए कोई कार्य या व्‍यवसाय उपलब्‍ध करता था । वह उन्‍हें धन या भूमि अनुदान के रूप में देता था जिससे वह कृषि कर सकें । उसने इस बात का प्रयास किया कि भिक्षावृत्ति उसके राज्‍य से समाप्‍त हो जाये और इसके लिये वह भिक्षुओं को किसी लाभदायक व्‍यवसाय ग्रहण करने के लिये तैय्यार करता था ।
            ‘‘भैष्जिक सहायता की भी उपेक्षा न की जाती थी-मुहम्‍मद बिन तुगलक के काल में दिल्‍ली नगर में सत्तर चिकित्‍सालय थे’’
            मुस्लिमकाल  में भी शासकों ने इस्‍लाम के सिद्धान्‍तों के अनुसार ही समाज की शासन व्‍यवस्‍था को संगठित किया । जकात एवं खैरात जैसी इस्‍लामी अवधारणाओं को सामाजिक मान्‍यता प्राप्‍त हुई । असहाय तथा निर्धन व्‍यक्तियों की सहायता करना इस्‍लाम धर्म का एक आधारभूत अंग था । F.S.T. [Firoz shah Tughlaq]  (फिरोज तुगलक) के समय अनेक औषधालयों का निर्माण किया था जहाँ गरीब व्‍यक्तियों का नि:शुल्‍क उपचार किया जाता था । अकबर के काल में अनेक समाज सुधार किए गए । अकबर ने दीन इलाहीं चलाया । दास प्रथा को समाप्‍त किया एवं यात्री कर तथा जंजिया कर लगाया ताकि कल्‍याण कार्य किया जा सके । अकबर ने एक आदेश दिया कि यदि कोई विधवा सती न होना चाहे तो उसे बाध्‍य नहीं किया जाए ।आदि
            भारत में काफी अधिक समय से पारसी लोग भी रहते हैं । पारसियों के धर्म में भी दान को बड़ा महत्त्व दिया गया है । पारसियों  ने यहाँ धर्मशालाएँ, तालाब, कुयें, विद्यालय आदि बनवाए । उन्‍होंने बहुत से न्‍यास स्‍थापित किये जिनमें से एक प्रसिद्ध न्‍यास बाम्‍बे पारसी पंचायत ट्रस्‍ट फन्‍ड्स है । इन प्रन्‍यास के उद्देश्‍यों में पारसी विधवाओं की सहायता,पारसी बालिकाओं की विवाह सम्‍बन्‍धी सहायता, नेत्रहीन पारसियों की सहायता, निर्धन पारसियों की सहायता,और धार्मिक शिक्षा सम्‍बन्‍धी सहायता सम्मिलित है ।

समाज सुधार आन्‍दोलन
(Social Reform Movement)
            जब अंग्रेज भारत में आये तो क्रिश्चियन मिशनों ने भी यहाँ अपना कार्य आरम्‍भ किया । क्रिश्चियन मिशनों ने अपने धर्म प्रचार के सम्‍बन्‍ध में विभिन्‍न प्रकार के समाज कल्‍याण सम्‍बन्‍धी कार्य किये ।
            1780 में बंगाल में सिरामपुर मिशन स्‍थापित हुआ । इस मिशन ने हिन्‍दू सामाजिक ढाँचे में सुधार लाने का प्रयास किया। उदाहरण स्‍वरूप इसे बाल विवाह, बहु विवाह, बालिका हत्‍या, सती एवं विधवा विवाह पर निषेध के विरूद्ध आवाज उठाई । इसके अतिरिक्‍त इस मिशन ने जाति प्रथा के विरूद्ध भी प्रचार किया । अपने इन विचारों को क्रियाशील रूप प्रदान करने हेतु इस मिशन ने अनेक समाज कल्‍याण संस्‍थायें स्‍थापित कीं जिनके द्वारा अभावग्रस्‍त एवं पीडि़त लोगों की सहायता की जाती थी । उस समय अधिकतर कल्‍याणकारी संस्‍थायें क्रिश्चियन मिशनों द्वारा स्‍थापित की गई थीं । कुछ समय पश्‍चात् ही लोक हितैषी व्‍यक्तियों, अन्‍य धार्मिक संस्‍थाओं, एवं राज्‍य ने इस क्षेत्र में कार्य करना आरम्‍भ किया । अट्ठारहवीं शताब्‍दी के अन्‍त में क्रिश्चियन मिशनों का प्रचार भारत के विचारशील लोगों के लिए एक चुनौती का रूप रखता था । अत: इस चुनौती का सामना करने के लिए अनेक लोग तैयार हुए । इस प्रकार के एक व्‍यक्ति राजा राम मोहन राय थे जिन्‍होंने भारतकी प्रथाओं में सुधार लानेका प्रयास किया । उन्‍होंने विशेष प्रकार से जाति प्रथा और सती प्रथा का विरोध किया और अनेक शैक्षिक संस्‍थाओं की स्‍थापना की । उन्‍होंनेब्रह्म समाज की स्‍थापना की जिसका एक उद्देश्‍य हिन्‍दुओं को ख्रिश्चियन धर्म स्‍वीकृत करने से सुरक्षित रखना था । ब्रह्म समाज ने अकाल सहायता,बालिका शिक्षा, स्त्रियों के उत्‍थान और मद्यनिषेध एवं दान प्रोत्‍साहन के कार्य किये । ज्‍योतिबा फूले ने जाति प्रथा के सुधार का प्रयास किया और अनेक संस्‍थायें उदाहरण स्‍वरूप अनाथालय एवं बालिका विद्यालय आदि स्‍थापित किये ।
            अट्ठारहवीं और उन्‍नीसवीं शताब्‍दी में भारत में समाज सेवा पद्धति के मुख्‍य उद्देश्‍य दो थे । (1)भारत के सामाजिक एवं धार्मिक ढाँचे को पुन:जीवित करना और उसे विदेशी धर्म एवं संस्‍कृति से सुरक्षित रखना और (2) समाज सेवी संस्‍थाएँ स्‍थापित करना जिनसे भारतके निवासियों को क्रिश्चियन मिशनों द्वारा स्‍थापित सामाजिक सेवाओं के प्रयोग की आवश्‍यकता न रह जाये । इस प्रकार यहाँ की समाज सेवा को क्रिश्चियन मिशनों द्वारा स्‍थापित सामाजिक सेवाओं द्वारा अप्रत्‍यक्ष रूप से प्रोत्‍साहन मिला ।
            1897 में स्‍वामी विवेकानन्‍द ने रामकृष्‍ण मिशन स्‍थापित किया । इस मिशन का संगठन क्रिश्‍चन मिशनों के संगठन के नमूने पर हुआ । ब्रह्मसमाज और आर्यसमाज से भी अधिक राम कृष्‍ण मिशन ने समाज सेवा के कार्य किये ।
            अंग्रेजों के आगमन से प्रथम चरण में प्रगति के कार्य बड़े कम स्‍तर पर हुए । कालान्‍तर में पाश्‍चात्‍य शिक्षा का प्रभाव जिसने भारतीय चिंतन को प्रभावित किया ।भारतीय सुधारक पाश्‍चात्‍य विचारों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके एवं इस प्रकार प्रभावित होकर सामाजिक परिवर्तन के लिए कार्य करने लगे । अंग्रेजों ने यह प्रमाणित कर दिया कि हिन्‍दू सामाजिक संरचना में सामाजिक सुधार आवश्‍यक है । मुख्‍यत: बहुविवाह, बाल विवाह, बालिका की हत्‍या, सतीप्रथा एवं विधवा पुन:विवाह सम्‍बन्‍धी सुधारों पर बल दिया गया ।
            अंग्रेजों के भारत में आने से यहाँ प्रज्ञावाद, प्रजातंत्र एवं उदारता की विचारधाराओं का प्रवेश हुआ । इन विचारधाराओं ने भारत के विचारशील व्‍यक्तियों को प्रभावित किया । बीसवीं शताब्‍दी के समाज सुधारकों में गोपाल कृष्‍ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक का नाम मुख्‍य रूप से प्रसिद्ध है । यह दोनों ही व्‍यक्ति प्रज्ञावादी थे परन्‍तु तिलक का उद्देश्‍य समाज सुधार के साथ साथ देश के लिये स्‍वतंत्रता प्राप्‍त करना भी था । तिलक ने 1905 में सर्वेन्‍टस आफ इन्डिया सोसाइटी की स्‍थापना की । यह भारत में समाज सेवा के क्षेत्र की सर्वप्रथम असाम्‍प्रदायिक संस्‍था थी । बीसवीं शताब्‍दी के दूसरे दस वर्षों में महात्‍मा गांधी ने भारत की सामाजिक एवं राजनैतिक परिस्थिति को प्रभावित किया । उन्‍होंने राजनैतिक विद्रोह एवं समाजसुधार के बीच का एक मार्ग बनाया ।उन्‍होंने भारत की स्‍वतंत्रता के लिये संग्राम के साथ-साथ यहाँ के सामाजिक एवं आर्थिक उत्‍थान के लिये भी प्रयास किया । उन्‍होंने हरिजन सेवक संघ की स्‍थापना की जिसका उद्देश्‍य हरिजनों की सामाजिक एवं आर्थिक दशाओं में सुधार करना था । उन्‍होंने स्‍वयं हरिजनों के सामाजिक एवं आर्थिक दशाओं में सुधार करना था । उन्‍होंने स्‍वयं हरिजनों के सामाजिक उत्‍थान के लिये अथक प्रयास किया ।
            सुधार क्‍यों ? एक महत्त्वपूर्ण प्रश्‍न यह है कि वह कौन-सी शक्ति थी जिसने भारत में जागरण की लहर को जन्‍म दिया । क्‍या यह पाश्‍चात्‍य प्रभाव के परिणामस्‍वरूप हुआ ? या यह केवल औपनिवेशिक हस्‍तक्षेप का जवाब भर था ।इसका एक आयाम भारतीय समाज में आ रहें उन बदलावों से जुड़ा है जिसके फलस्‍वरूप नए वर्गों का उदय हो रहा था ।
            सुधार आन्‍दोलनों पर शुरू में लिखे गए इतिहास ग्रंथों में पश्चिमी प्रभाव को ही पुनर्जागरण की उत्‍पत्ति का मुख्‍य कारण माना गया है, जो प्रारंभिक ग्रंथ-मिलते हैं उनमें से एक जे.एन.फर्खुहार द्वारा लिखे गए ग्रंथ-मॉडर्न रिलीजियस मूवमेंट इन इंडिया के अनुसार –‘‘प्रेरक शक्तियाँ  करीब- करीब केवल पाश्‍चात्‍य ही है’’
सुधारों का विस्‍तार क्षेत्र
          The Charles Act of 1813 के अंतर्गत शिक्षा के विकास का प्रावधान किया गया तथा अंग्रेजों द्वारा किए गए कार्य को स्‍वीकृति प्रदान की गयी । इन लोगों ने शिक्षा के प्रसार पर बल दिया । राजाराम मोहन राय पहले भारतीय थे जिन्‍होंने समाज़ में ऐसी शक्तियों को गति दिया, जिससे कई सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया गया । सती प्रथा के विरोध में उनका प्रथम लेख 1818में प्रकाशित हुआ । उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि 1829 में लार्ड विलियम बैटिंग द्वारा Regulating Act पारित करते हुए सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया गया । 1815में उन्‍होंने आत्‍मीय समाज स्‍थापित किया जो 1828 में Brahmo Samaj के रूप में विकसित हुआ जिसने मूर्ति पूजा का विरोध किया ।
            केशव चन्‍द्र सेन एक ऐसे समाज सुधारक थे जिन्‍होंने स्‍त्री शिक्षा को सबसे अधिक महत्‍व दिया। ईश्‍वर चन्‍द्र विद्यासागर एक और समाज सुधारक थे जिनके प्रयासों द्वारा Hindu Remarriage Act 1856 में पारित किया गया । जस्टिस रानाडे ने विधवा पुन: विवाह के लिए एक Association की स्‍थापना की । (1861 Widow Marriage Association)
            इस बदली हुई परिस्थितियों में 1885 में Indian National Congress की स्‍थापना ए.ओ.ह्यूम ने की, यद्यपि ह्यूम ने इसे सुरक्षा वाल्‍व के रूप में इसे स्‍थापित किया तथापि कालान्‍तर में इसने समाज में काफी सुधार लाया । 1887 में समाज सुधार के लिए एक नवीन संगठन की स्‍थापना की गयी जो Indian Social Conference के नाम से जाना गया । रानाडे इसके सचिव बने । इसका उद्देश्‍य बाल विवाह तथा दहेज प्रथा को बन्‍द करना, स्‍त्री शिक्षा का प्रसार करना आदि था । इस क्रम को आगे बढ़ाया आर्य समाज ने इसकी स्‍थापना दयानन्‍द सरस्‍वती ने 1875 में किया । इनका उद्देश्‍य बाल विवाह, स्‍त्री शिक्षा एवं इनका कहना था कि वेदों की ओर लौटो । अपनी पुस्‍तक सत्‍यार्थ प्रकाश में इन्‍होंने हिन्‍दू धर्म में उत्‍पन्‍न सामाजिक बुराइयाँ को दूर करने के लिए कहा ।
            इसके बाद स्‍वामी विवेकानन्‍द ने रामकृष्‍ण मिशन की स्‍थापना 1897 में की । इसने जाति प्रथा तथा मूर्तिपूजा का विरोध किया । इसी तरह सैयद अहमद खां का अलीगढ़ आन्‍दोलन थियासाफिकल सोसायटी, आदि ने भी समाज सुधार में काफी योगदान दिया ।
समाज सेवा संगठन
Social Service Organization
            1882 में पंडित रमाबाई द्वारा पूना में आर्य महिला समाज नामक संस्‍था की स्‍थापना की गई । इस संस्‍था द्वारा अनेक स्‍थानों पर अनाथालयों तथा लड़कियों के लिए स्‍कूलों की स्‍थापना की गई । इसके बाद 1887 में शशिपद बनर्जी द्वारा बंगाल में हिन्‍दू विधवा के लिए एक विधवा गृह की स्‍थापना की गई । इसी प्रकार प्रो.डी.के. कार्वे द्वारा पूना में एक विधवा गृह की स्‍थापना की गई ।
            गांधी जी ने सर्वोदय की अवधारणा का प्रतिपादन किया। उन्‍होंने देश में रामराज्‍य की स्‍थापना की कल्‍पना की और एक ऐसे समाज की कल्‍पना की जिसमें व्‍यक्ति के सम्‍पूर्ण विकास के लिए उचित दशाएँ उपलब्‍ध हों । उन्‍होंने हरिजन कल्‍याण जन-जातियों के कल्‍याण, महिला कल्‍याण जैसे कार्यक्रमों की एक रचनात्‍मक व्‍यवस्‍था लाने की बात की । 1929 में Sharda Act पारित करके बालिकाओं के लिए 14 वर्ष एवं बालकों के लिए 18 वर्ष की आयु शादी के लिए निर्धारित कर दी गयी ।
समाज सेवा के लिये प्रशिक्षण
            भारत में प्राचीन काल से ही समाज सेवा प्रदान करने के लिये प्रशिक्षण दिया जाता रहा है, परन्‍तु यह प्रशिक्षण एक नैतिक वातावरण में और अनौपचारिक रूप से दिया जाता था ।औपचारिक रूप से व्‍याख्‍यान एवं व्‍यावहारिक शिक्षा का प्रबन्‍ध प्राचीन समय में न था। बीसवीं शताब्‍दी में बम्‍बई में पहली बार इस प्रकार का प्रयास किया गया जबकि वहाँ सोशल सर्विस लीग की स्‍थापना हुई । इस संस्‍था ने स्‍वयं सेवकों के लिये अल्‍पावधि वाला पाठ्यक्रम चालू किया । इस पाठ्यक्रम का उद्देश्‍य स्‍वयं सेवकों को समाज सेवा के लिये तैयार करना था । भारत में 1936 के पहले समाज कार्य को एक ऐच्छिक क्रिया समझा जाता था । 1936 में पहली बार समाज कार्य की व्‍यावसायिक शिक्षा के लिए एक संस्‍था सर दोराबजी टाटा ग्रेजुएट स्‍कूल आफ सोशल वर्क के नाम से स्‍थापित हुई । इस समय इस बात की स्‍वीकृति भारत में हो चुकी थी कि समाज कार्य करने के लिये औपचारिक शिक्षा अनिवार्य थी । तत्‍पश्‍चात् इस विद्यालय का नाम टाटा इन्‍स्‍टीट्यूट आफ़ सोशल साइन्‍स हो गया और अब भी यह इसी नाम से प्रसिद्ध है ।
            निष्‍कर्षत: कहा जा सकता है कि भारत में समाज कार्य की सैद्धान्तिक पृष्‍ठभूमि प्राचीन है किन्‍तु समाज कार्य के वैज्ञानिक स्‍वरूप का विकास काफी विलम्‍ब में हुआ ।
यू.पी.पी.सी.एस. में पूछे गये प्रश्‍न
1. समाज कार्य का विकास ज्ञान से मानवाधिकारों की प्राप्ति के लिये संघर्ष की दिशा में हुआ है । इस कथन की समीक्षा किजिए । (1990)
2. मूल्‍य की परिभाषा दीजिये व समाज कार्य मूल्‍यों की विवेचना कीजिये । (1990)
3. समाज कार्य अभ्‍यास के सामान्‍य आधार की विवेचना कीजिये । (1990)
4. भारत में समाज कार्य के इतिहास पर संक्षिप्‍त निबंध लिखो । (1991)
5. समाज कार्य की विशेषताओं, उद्देश्‍यों व मौलिक मान्‍यताओं का विश्‍लेषण कीजिये । (1991)
6. अमेरिका में समाजकार्य के ऐतिहासिक विकास पर प्रकाश डालिये । (1999)
7. समाज कार्य केवल प्रजातंत्र में पनपता है विवेचना कीजिये । (1999)
8. समाज कार्य दूसरों की सहायता करने की प्रक्रिया है । इस कथन की समीक्षा करते हुए निम्‍न विषयों पर प्रकाश डालिये । (2000)
(i) समाजकार्य दर्शन (ii) समाजकार्य मूल्‍य (iii) समाजकार्य व मानवाधिकार
भारत में सामाजिक कार्य की ऐतिहासिक पूष्‍ठभूमि
            भारत में सामाजिक कार्य की लम्‍बी परम्‍परा है । विपत्ति के समय व्‍यक्ति की सहायता का दायित्‍व बिरादरी और शासक दोनों पर था । सामन्‍ती युग में भी संगी-साथियों और पड़ोसियों के लिए त्‍याग और सेवा की मर्यादा स्‍थापित थी । दानशीलता तथा भ्रातृभावना का बहुत मान था । भगवद्गीता के अनुसार देश, काल और पात्र को देखकर दिया गया दान ही सार्थक दान है । अर्थ, विद्या और अभय, दान के तीन रूप माने गये थे । मन्दिर, धर्मशाला और मठ जैसी संस्‍थाएँ समाज-सेवा के प्रमुख केन्‍द्र थे । उनमें निर्धनों को आश्रय तथा भोजन नि:शुल्‍क देने की व्‍यवस्‍था थी । इस प्रकार दान, मानव सेवा और पारस्‍परिक सहायता को धर्म ने महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया था ।
हिन्‍दू युग
            कौटिल्‍य ने अपने अर्थशास्‍त्र में लिखा है कि निर्धन, वृद्ध, निराश्रित और असमर्थ लोगों की देख-रेख का मार राजा पर हैं । आर्थिक दृष्टि से विपन्‍न व्‍यक्तियों के लिए कारखानों की स्‍थापना का भी उल्‍लेख मिलता है । अशोक के शासनक-काल में ऐसे गोपोंकी नियुक्ति का उल्‍लेख मिलता है जो जाति, गोत्र, व्‍यवसाय, जन्‍म, मृत्‍यु, विवाह आदि का लेखा-जोखा रखते थे । गोपों के कार्य सामाजिक कार्यकर्ताओं से बहुत मिलते-जुलते हैं । अकाल के समय राजाओं और सरकारों की और से मुफ्त भोजन और गृहहीनों के लिए आश्रय का प्रबन्‍ध किया जाता था । संयुक्‍त परिवार, जाति और ग्राम पंचायत आदि की व्‍यवस्‍था ऐसी थी जिसमें समाज के बीमार, वृद्ध, निराश्रित तथा विकलांग सदस्‍यों की आवश्‍यकताओं की पूर्ति हो जाती थी ।
मुस्लिम काल
            मुस्लिम काल में सामाजिक संस्‍थाओं में परिवर्तन हुआ और जनता के लिए कल्‍याण सेवाओं की व्‍यवस्‍था में राज्‍य ने भी कुछ अंशों में योगदान किया । इस दिशा में शेरशाह सूरी और अकबर के सुधार-कार्य उल्‍लेखनीय हैं । उस समय जकातकी प्रथा के अन्‍तर्गत हर व्‍यक्ति अपनी आय का पांचवाँ हिस्‍सा दान में देता था । शासन द्वारा इस दान की देख-भाल के लिए व्‍यवस्‍था की गयी थी ।
ब्रिटिश काल
          ब्रिटीश काल में समाज एक ओर तो शिक्षा और आर्थिक परिवर्तन से और दूसरी और ईसाई मिशनरियों की सेवाओं तथा भारतीय सामाजिक एवं धार्मिक सुधारों से प्रभावित हो रहा था । इन सुधारकों ने अस्‍पृश्‍यता, सती, प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह-निषेध आदि अनेक कुरीतियों के उन्‍मूलन और नारी के समान, अधिकारों की प्राप्ति के लिए प्रयन्‍त किया । इस सम्‍बन्‍ध में राजा राममोहन राय- जिन्‍होंने ब्रह्मसमाज की स्‍थापना की, जस्टिस रानाडे जिन्‍होंने सन् 1870 में विधवा पुनर्विवाह संघ (विडो रीमैरिज एसोसिएशन) की स्‍थापना की, और सर सैयद अहमद खां, जिन्‍होंने सन् 1885 में अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्‍लाम  की नींव डाली, के नाम उल्‍लेखनीय हैं । इनके अतिरिक्‍त ईसा की उन्‍नीसवीं शती के अंतिम चरण में स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती ने आर्य समाज की, स्‍वामी विवेकानन्‍द ने रामकृष्‍ण मिशन की और श्रीमती एनी बेसेंट ने थियोसाफिकल सोसायटी की स्‍थापना की। सर्वेण्‍ट्स ऑफ इण्डिया सोसायटी की स्‍थापना सन् 1905 में हुई । इन सब संस्‍थाओं के अतिरिक्‍त ईसाई मिशनरियों ने देश में अपने सामाजिक और धार्मिक कार्यों का विस्‍तार जारी रखा ।
            सन् 1920 में भारतीय रंगमंच पर महात्‍मा गांधी के अवतरण से सामाजिक सुधारकों और राजनीतिक विद्राहियों के बीच की खाई पट गयी। ऐच्छिक सेवा कार्य की नींव पहले ही पड़ चुकी थी । महात्‍मा गांधी के नेतृत्‍व में सेवाग्राम(जिला वर्धा) में हरिजन सेवक संघ तथा अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ की स्‍थापना हुई । ये संगठन उनके उस रचनात्‍मक कार्यक्रम के अंग थे जो जनता की आर्थिक प्रगति और सामाजिक जीवन के सुधार का आंदोलन था ।
नयी प्रवृत्तियाँ  
          सामाजिक कार्य की इन परम्‍पराओं पर विभिन्‍न सामाजिक और आर्थिक तत्‍वों का प्रभाव पड़ा । उद्योगीकरण और नगरीकरण के कारण भी जीवन का ढाँचा बदला । संयुक्‍त परिवार, जाति-व्‍यवस्‍था और ग्राम पंचायत जैसी सामाजिक संस्‍थाएँ कमजोर पड़ने लगीं । ऐसी नई समस्‍याएँ उठ खड़ी हुई जिनका समाधान तत्‍कालीन सामाजिक संस्‍थाएँ नहीं कर सकीं । दिन-प्रति-दिन जटिल होती हुई इन सामाजिक समस्‍याओं को हल करना लोकोपकार की भावना पर आधारित आन्‍दोलन के लिए सम्‍भव न था । समाज विज्ञानों के विकास के कारण इन समस्‍याओं का व्‍यापक और वैज्ञानिक समाधान प्रस्‍तुत करने के निमित्‍त इनका विधिवत् अध्‍ययन सम्‍भव हो गया । इसीलिए हम केवल दान पर निर्भर न रहकर आत्‍म-सुधार के संगठित प्रयास की ओर अग्रसर हुए । आजकल सामाजिक समस्‍याओं के समाधान में वैज्ञानिक विधियों पर बल दिया जा रहा है । अर्थात् समस्‍याओं के सामाजिक और आर्थिक कारणों का अध्‍ययन किया जाता  है और उन्‍हें हल करने के लिए विशेष कौशल और प्रविधियाँ काम में लाई जाती हैं ।
            सामाजिक कार्य का पहला विद्यालय बम्‍बई में सन् 1936 में स्‍थापित हुआ । यहाँ सामाजिक कार्यकर्ताओं को वैज्ञानिक पद्धति पर समाज-सेवा कार्य का प्रशिक्षण दिया जाता था । उस समय सामाजिक कार्य का निश्चित दर्शन और प्रविधियाँ विकसित हो चुकी थीं ।
स्‍वतंत्रता के पश्‍चात् कल्‍याण के क्ष्‍ेात्र में राज्‍य का योगदान
          स्‍वतंत्रता के पूर्व समाज कल्‍याण के क्षेत्र में राज्‍य का कार्य बहुत सीमित था । केन्‍द्र अथवा राज्‍यों में समाज कल्‍याण सम्‍बन्‍धी समस्‍याओं की देख-रेख करने वाला कोई विभाग न था । देश के बँटवारे के बाद पुनर्वास मंत्रालय की स्‍थापना हुई, जिसने पाकिस्‍तान से आये हुए विस्‍थापितों के पुनर्वास का कार्य अपने हाथ में लिया । भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कल्‍याण का उत्‍तरदायित्‍व केन्‍द्रीय गृह मंत्रालयों को सौंपा गया । अनुसूचित जातियों और जन-जातियों के आयुक्‍त की भी नियुक्ति की गई । पंच-वर्षीय योजनाओं के अंतर्गत ग्रामीण जीवन के सामाजिक और आर्थिक विकास का एक व्‍यापक कार्यक्रम हाथ में लिया गया । इस कार्य की देखरेख इस समय,सहकारिता, पंचायती राज तथा सामुदायिक विकास मंत्रालय द्वारा की जा रही है । शिक्षा मंत्रालय ने देहरादून में नेत्रहीनों की शिक्षा और पुनर्वास के लिए दो संस्‍थाओं की स्‍थापना की है । श्रमिकों के लिए सामाजिक बीमा एवं कल्‍याण सेवाओं सम्‍बन्‍धी कानून तेजी से बने और फलत: श्रम मंत्रालय के दायित्‍व में कई गुना वृद्धि हो गई ।
            सन् 1953में केन्‍द्रीय समाज कल्‍याण बोर्ड की स्‍थापना हुई ।इसकी अध्‍यक्षा समाज कल्‍याण के क्षेत्र में अग्रगण्‍य श्रीमती दुर्गाबाई देशमुख नियुक्‍त की गई । इसके सदस्‍य तीन क्षेत्रों से लिये गए –(1) ऐच्छिक कल्‍याण संस्‍थाएँ; (2) केन्‍द्रीय सरकार के मंत्रालय; और (3) संसद। कल्‍याण कार्यक्रमों के संचालन में सरकारी और गैर-सरकारी संस्‍थाओं का सहयोग एक ऐसा प्रयोग था जो अभी तक उन देशों में भी नहीं हुआ था जहाँ लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था काफी अरसे से है । इस बोर्ड का एक महत्‍वपूर्ण कार्य था ऐच्छिक सहायता देना और अछूते क्षेत्रों में नये कार्यक्रम आरम्‍भ करना तथा कराना । इसी बीच उत्‍तर प्रदेश, पंजाब, बम्‍बई, आन्‍ध्र, हिमाचल प्रदेश,राजस्‍थान तथा दिल्‍ली आदि राज्‍यों में भी समाज कल्‍याण निदेशालयों की स्‍थापना हुई । इनका कार्य अपने-अपने राज्‍यों में कल्‍याण कार्यों की व्‍यवस्‍था करना था । आज लगभग सभी राज्‍यों में समाज कल्‍याण निदेशक हैं ।
ब्रिटीश युग (The British Period)
ब्रिटीश युग को दो भागों में विभक्‍त किया जा सकता – (i) ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी का शासन, (ii) 1857 में ब्रिटिश ताज द्वारा प्रशासन सँभालना ।
            ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी का मुख्‍य उद्देश्‍य उस द्वारा विजित प्रदेशों को संघटित करना, उनका विस्‍तार करना एवं कानून तथा व्‍यवस्‍था का प्रबन्‍ध करना था । अतएव, इसने समाज सेवाओं एवं सामाजिक कल्‍याण उपायों की और कम ध्‍यान दिया । वारन हेस्टिंग्‍स ने सर्वप्रथम घोषित किया कि न्‍याय एवं लोगों के कल्‍याण को उन्‍नत करना सरकार का दायित्‍व है । तदनुसार,उसने 1791में मुसलमानों के लिए कलकत्‍ता तथा हिन्‍दुओं के लिए बनारस में महाविद्यालयों की स्‍थापना की । 1913 के चार्टर अधिनियम ने स्‍पष्‍ट तौर पर घोषित किया था कि लोकशिक्षा राज्‍य का प्राथमिक कर्तव्‍य है । सर चार्ल्‍स वुड (Sir charies wood) ने 1854 में भारत को भेजे गये पत्र में राज्‍य द्वारा आंशिक रूप में प्रबन्धित, विनियमित एवं सहायता प्राप्‍त पूर्ण आधुनिक शैक्षिक प्रणाली का उल्‍लेख किया था ।
            इसी प्रकार, जन स्‍वास्‍थ्‍य भी राज्‍य का दायित्‍व स्‍वीकृत किया गया । अस्‍पताल जो आरम्‍भ में यूरोपीयनों के लिए थे, भारतीयों के इलाज के लिए भी स्‍थापित किये गये । अनेक नगरों की पानी निकाल प्रणाली को सुधारा गया तथा पीने के लिए शुद्ध पानी का भी प्रबन्‍ध किया गया । इन उपायों को छोड़कर कम्‍पनी के शासन के दौरान अन्‍य कोई कल्‍याणकारी कार्य नहीं किये गये । हाँ, कुछ समाज सुधार सती प्रथा पर प्रतिबन्‍ध लगाकर एवं विधवाओं को पुनर्विवाह की अनुमति देकर क्रमश: 1829 एवं 1856 में पारित अधिनियमों द्वारा किये गये ।
            ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी द्वारा 1857 में ब्रिटिश ताज को शक्ति हस्‍तान्‍तरण के पश्‍चात् लोक कल्‍याण कार्यों को समाज सेवाओं, समाज सुधार,सामाजिक विधान,सामाजिक सुरक्षा एवं समाज कल्‍याण में वर्गीकृत किया जा सकता है जिनका विवरण निम्‍नलिखित है –
        I.            सामाजिक सेवाएँ (Social Services)-
ब्रिटिश सरकार को भारत में जनोपयोगी एवं सामाजिक सेवाओं, यथा रेलों, सड़कों, सिंचाई साधनों,शिक्षा, जनस्‍वास्‍थ्‍य एवं आवास आदि का विस्‍तार करने एवं उनको व्‍यापक बनाने का श्रेय जाता है । हंटर आयोग ने 1882 में प्रस्‍तावित किया था कि प्राथमिक एवं माध्‍यमिक शिक्षा का विस्‍तार एवं इसे उन्‍नत किया जाये, प्रौद्योगिक शिक्षा एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण को प्रोत्‍साहित किया जाये, निजी उपकरण को सरकारी अनुदान प्रणाली द्वारा उत्‍प्रेरित किया जाये। लार्ड मैकाले ने पब्लिक स्‍कूलों में अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्‍यम बनाये जाने की सिफारिश की । उच्‍चतर शिक्षा को  उन्‍नत करने के लिए सरकार ने 1902 में भारतीय विश्‍वविद्यालय आयोग स्‍थापित किया तथा 1904 में भारतीय विश्‍वविद्यालय अधिनियम पारित किया । भारत सरकार कानून 1919 में शिक्षा को प्रान्‍तीय विषय घोषित किया गया । अंत: प्रान्‍तों की लोकप्रिय सरकारों ने शिक्षा प्रसार को संवेग प्रदान किया । हरटोग समिति रिपोर्ट के 1928में, अबोट एवं वुड रिपोर्ट के 1937 में, जाकिर हुसैन समिति रिपोर्ट के 1938 एवं 1940 में तथा सारजेट स्‍कीम के 1944 में प्रकाशन ने शिक्षा की प्रगति को पर्याप्‍त योगदान दिया ।
जन-स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में, शाही आयोग1859 जो भारतीय सेना की स्‍वास्‍थ्‍य दशाओं का परीक्षण
करने हेतु नियुक्‍त किया गया था, उसने नागरिक जनसंख्‍या के स्‍वास्‍थ्‍य को सुधारने के लिए भी सिफारिशें की थीं । प्‍लेग आयोग 1904 ने भी जन स्‍वास्‍थ्‍य सेवा प्रदान किये जाने की सिफारिश की । परन्‍तु ये सेवाएँ केवल नगरीय क्षेत्रों में ही क्रियान्वित की गयीं, भारत सरकार अधिनियम 1919 द्वारा जन स्‍वास्‍थ्‍य, चिकित्‍सीय शिक्षा, अस्‍पतालों, औषधालयों एवं अनाथालयों के प्रशासन को हस्‍तान्‍तरित  विषय-जिनका प्रबन्‍ध प्रान्‍तीय सरकारों द्वारा किया जाना था, घोषित किया गया । भारत सरकार अधिनियम, 1935 में जन-स्‍वास्‍थ्‍य एवं चिकित्‍सीय शिक्षा के प्रशासन एवं व्‍यवस्‍थापन हेतु प्रान्‍तों को स्‍वायत्‍तता प्रदान की गयी ।परन्‍तु प्रान्‍तीय सरकारों द्वारा प्रदत्‍त सेवाएँ विशाल देश की आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने के लिए अपर्याप्‍त थीं, ग्रामीण क्षेत्रों में तो इनकी दशा शोचनीय थी ।
            जहाँ तक आवास प्रश्‍न है, ब्रिटिश शासन के दौरान इस दिशा में कोई विकास नहीं हुआ यद्यपि श्रम जाँच समिति (रेग समिति) ने 1944 में तथा श्रम शाही आयोग ने सिफारिश की थी कि आवास व्‍यवस्‍था, सरकार, नियोक्‍ताओं एवं नगरपालिकाओं का दायित्‍व होना चाहिए । इस प्रकार,आवास सबसे अधिक उपेक्षित समाज सेवा रही ।
   II.            समाज सुधार (Social Reform)
ब्रिटिश सरकार भारतीय समाज में प्रचलित सामाजिक कुरीतियों यथा बाल-विवाह, दहेज प्रथा,महिलाओं को उत्‍तराधिकार से वंचित रखना, अनुसूचित जातियों के मन्दिर में प्रवेश की मनाही आदि से परिचित थी । अतएव इसने समाज को इन कुरीतियों से मुक्‍त करने के लिए अधिनियम बनाये जैसे सहमति आय, कानून (Age of Consent Act) जिसके द्वारा नवयुवतियों की आयु 10 से 12वर्ष तक कर दी गई जो बाद में शारदा कानून 1929 द्वारा तथा दूसरे कानूनों द्वारा और बढ़ा दी गयी-यह आयु सीमा महिलाओं के उत्‍तराधिकार अधिकारों, गोद लेना, कानून के सम्‍मुख विवाह (Civil marriage), न्‍यायिक पृथकीकरण एवं विवाह विच्‍छेद, बालिकाओं का मन्दिर को अर्पण आदि विषयों में लागू होती थी ।
      यह उल्‍लेख किया जा सकता है कि इस काल के दौरान समाज सुधार प्रयासों एवं अधिनियम को देशीय समाज सुधारकों जिनमें ब्रिटेन में प्राप्‍त उद्धार शिक्षा का प्रभाव था, संगठनों यथा आर्य समाज, रामकृष्‍ण मिशन, ईसाई प्रचारकों, ब्रिटेन में कल्‍याण-कारी गतिविधियों के विकास तथा अन्तिम स्‍वतंत्रता आंदोलन के नेताओं प्रमुखतया महात्‍मा गांधी के कारण संवेग प्राप्‍त हुआ था ।
III.            सामाजिक सुरक्षा (Social Security)-
औद्योगीकरण के आगमन से श्रमिकों  के लिये दुर्घटना, मृत्‍यु, वृद्धायु, बेरोजगारी आदि से जनित अयोग्‍यता के कारण क्षतिपूर्ति, कार्य समय के नियमन, कार्य  करने की संतोषजनक  दशा, औद्योगिक सुरक्षा आदि के रूप में सामाजिक सुरक्षा की व्‍यवस्‍था की आवश्‍यकता अनुभव की गई । प्रथम विश्‍वयुद्ध के बाद श्रमिक संगठनों,मजदूर संघों में नेताओं, समाज सुधारकों, प्रगतिशील नियोक्‍ताओं एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय श्रम संगठनों ने श्रमिक कल्‍याण हेतु समुचित सामाजिक सुरक्षा उपाय उठाने के लिये कहा । परिणामस्‍वरूप, भारत सरकार ने श्रम कल्‍याण हेतु विभिन्‍न अधिनियम यथा फैक्‍टरी कानून 1922,श्रमिक क्षतिपूर्ति कानून 1923, भारतीय ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926, व्‍यापार विवाद कानून (Trade Dispute Act,1929) पारित किये । इसी प्रकार राज्‍य सरकारों ने स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व प्रसूति लाभ अधिनियम (Maternity Benefits Act) पारित किये ।
IV.            समाज कल्‍याण (Social Welfare)-
ब्रिटिश सरकार ने समाज के अलाभान्वित एवं अव-विशेषाधिकार प्राप्‍त वर्ग, यथा अनुसूचित जातियों, अनुसूचित कबीलों एवं पिछड़ी जातियों के लिये समाज कल्‍याण लाभ देने की दिशा में कोई महत्‍वपूर्ण कार्य नहीं किया, केवल उनके लिये शैक्षिक सुविधाओं की व्‍यवस्‍था की और यह भी काफी देर बाद 1944 में जब केन्‍द्रीय सरकार ने पिछड़ी जातियों की शिक्षा के लिये विशेष व्‍यवस्‍था की । देशी रियासतों, जैसे ट्रांवनकोर, कोचीन, मैसूर एवं बड़ौदा ने पिछड़े वर्गों के उत्‍थान हेतु समाज कल्‍याण उपायों,नि:शुल्‍क शिक्षा-पुस्‍तकों एवं भरण-पोषण भत्‍तासहित की व्‍यवस्‍था द्वारा- को आरम्‍भ किया । समाज के अन्‍य वंचित वर्गों और अशक्‍तों की, आर्थिक दशा को सुधारने की ओर कोई ध्‍यान नहीं दिया गया ।
            समाज कल्‍याणके उपायों को ऊपर लिखित रूपों में प्रदान करने के लिए सरकार विभिन्‍न कारकों से प्रभावित हुई, यथा औद्योगीकरण  के दोष विशेषतया श्रमिकों का शोषण, नगरीकरण जिससे संयुक्‍त परिवार  टूटे और गंदगी, अस्‍वच्‍छता,अस्‍वास्‍थ्‍यकर दशाओं एवं प्रदूषण का जन्‍म हुआ, बेरोजगारी, सामाजिक एवं आर्थिक अन्‍याय, दो महायुद्धों से उत्‍पन्‍न विनाश एवं इससे प्रभावित लोगों,को पुनर्वास, तीसरे दशक की मंदी, श्रमिक संगठनों द्वारा अपने अधिकारों का बोध कर्मचारियों के प्रति नियोक्‍ताओं के दायित्‍व, शक्तिशाली ट्रेड यूनियन आंदोलन का जन्‍म, एवं उनका नेतृत्‍व, पाश्‍चात्‍य शिक्षा के माध्‍यम से प्राप्‍त उदारवाद की भावना, समाज सुधारकों के सतत् प्रयास तथा उनके द्वारा लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत करना,जन-शिक्षा, निर्धनों एवं वंचितों को राहत आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने में स्‍वैच्छिक संगठनों की अपर्याप्‍तता,राजनीतिक विचारधाराओं का प्रभाव, उदार प्रजातंत्रों द्वारा यह मान्‍यता कि कल्‍याणवाद साम्‍यवाद के प्रसार को रोक सकेगा,लोगों द्वारा विश्‍वास कि राज्‍य द्वारा चालित समाज कल्‍याण नीति एवं कार्यक्रम उनकी कुशलक्षेम के अनिवार्य तत्‍व है, राज्‍य द्वारा स्‍पष्‍ट तौर पर समझ लेना कि उसके लोगों की समृद्धि एवं संतुष्टि इसकी शक्ति में वृद्धि करेगी तथा अन्तिम स्‍वयं ब्रिटेन में कल्‍याणकारी राज्‍य की स्‍थापना ।
       समाज कार्य 
(SOCIAL WORK)
दर्शन शब्‍द का तात्‍पर्य एक दृष्टि देना है । दर्शन प्रत्‍येक विषय, कार्य, प्रक्रिया का हुआ करता है । दर्शन वह आदर्श मूल्‍य तथा नैतिक मापदण्‍ड होते हैं जो किसी व्‍यक्ति, विषय, कार्य प्रक्रिया की दिशा तय करते हैं । दर्शन जीवन की मौलिक मूल्‍य, सिद्धान्‍तों तथा अवधारणाओं से मिलकर बने होते हैं । दर्शन एक तर फ जीवन के मौलिक मूल्‍य सिद्धान्‍तों की प्रभावपूर्ण व्‍याख्‍या है तो दूसरी तर फ यह व्‍यक्त्‍िा समाज के आदर्श एवं नैतिक व्‍यवहार की व्‍याख्‍या करता हैं । ये दार्शनिक मूल्‍य, सिद्धांन्‍त तथा अवधारणायें ही होती हैं । दार्शनिक तत्त्व विषय को एक, एक मार्गदर्शन, एक मापदण्‍ड की स्‍थापना करते हैं जो व्‍यवहार की अच्‍छाई तथा बुराई को निर्धारित करता है ।
            जिस प्रकार भारतीय संविधान राजनीति विज्ञान, भौतिक विज्ञान का एक दर्शन है, उसी प्रकार समाज कार्य का भी अपना दर्शन है । ऐसा दर्शन जो जनकल्‍याण की व्‍याख्‍या करता है तथा सामाजिक मूल्‍यों को प्रभावपूर्ण बनाता है । समाजकार्य दर्शन व्‍यक्त्‍िा तथा समाज के सामाजिक सम्‍बंधों के सर्वोच्‍च आदर्श को निरूपित करता है जिससे समाज कार्य को एक मार्गदर्शन मिलता है । जिसको लक्ष्‍य करते हुए विलियम जेम्‍स ने कहा है कि ‘‘प्रत्‍येक प्राणी का एक दर्शन होता है, जो उसके जीवन का मार्गदर्शन करता है ।’’ समाज कार्य का मूल व्‍यक्ति की भलाई में निहित है ।इसका दर्शन जनकल्‍याण की व्‍याख्‍या करता है । इसलिए समाज कार्य को मूल्‍य, मान्‍यताएँ  तथा प्रत्‍यय मानवतावादी दृष्टिकोण तथा जनतंत्रवादी विचार पर आधारित है ।

समाज कार्य दर्शन
          हर्बट विस्‍नो ने अपनी पुस्‍तक समाज कार्य के दर्शन में इसका वर्णन 4 क्षेत्रों में विभाजित कर किया है ।
         1. व्‍यक्त्‍िा की प्रकृति के सन्‍दर्भ में

         
            -व्‍यक्ति अपने अस्तित्‍व के कारण मूल्‍यवान है । मनुष्‍य की अपनी महत्ता एवं गरिमा है ।
-मानव/व्‍यक्ति जन्‍म से न तो नैतिक है न अनैतिक है, न सामाजिक है और ना ही असामाजिक, वह जन्‍म के समय निरपेक्ष होता है । किन्‍तु मानव प्रकृति में पूर्ण विकास की क्षमता है।
            -इसके विकास के लिए सीखने की प्रक्रिया से शुरूआत होती है जिसका एक महत्त्वपूर्ण पहलू है अनुभव।
-व्‍यक्ति का प्रारम्भिक विकास में उसके पारिवारिक सम्‍बंधों (संस्‍कृति, प्रकृति तथा अनुभव) का प्राथमिक महत्त्व होता है ।
-मनुष्‍यों में उनके जैविक कारक तथा पर्यावरण के कारण महत्त्वपूर्ण अंतर होते हैं अत: उन्‍हें अवश्‍य स्‍वीकार करना चाहिए।
-व्‍यक्ति के समस्‍त मानव व्‍यवहार जैविकीय अवयव तथा उसके पर्यावरण के बीच अन्‍त:क्रिया का परिणाम है । समाज कार्य मानव व्‍यक्तित्‍व को एक यूनिट के रूप में स्‍वीकार करता है जो जटिल रूप से विभिन्‍न अवयवों का मिश्रण है । उसका कोई व्‍यवहार किसी एक अवयव के कारण नहीं घटित होता है । यहं उसके प्रकृति अनुभव/संस्‍कृति का सम्मिलित परिणाम है । यह भी संज्ञान में रखना चाहिए कि मानव का चयन हमेशा मनोवैज्ञानिक, भौतिक,आर्थिक सामाजिक तथा अन्‍य तत्‍वों को ध्‍यान में करके किया जाता है ।
-मानव में वैयक्तिक तथा सामाजिक दोनों आवश्‍यकताएँ होती है जिनकी पूर्ति समाज से करनी होती है । इस प्रकार मानवता पूर्ण विकास समाज के साथ समायोजन से ही हो सकता है क्‍योंकि वह समाज पर निर्भर है ।यदि वह आवश्‍यकताएँ पूरी नहीं होतीं तो मानव को पीड़ा की अनुभूति होती है । समाज कार्य इस समाज के सामंजस्‍य को पूर्ण करने में मदद कर उसको कम करने का प्रयास करता है ।
-व्‍यक्ति सम्‍भवत: विवेकपूर्ण कार्य नहीं करता ।

2. समूहों, व्‍यक्तियों, एवं समूहों और व्‍यक्तियों के परस्‍पर सम्‍बंधों के सन्‍दर्भ में
- समाज कार्य हस्‍तक्षेप न करने की नीति, सबसे उपयुक्‍त को जीवित रहने के सिद्धान्‍त को नहीं मानता है क्‍योंकि प्रत्‍येक व्‍यक्ति का अपना महत्‍व है तथा यह आवश्‍यक नहीं कि धनी तथा शक्तिशाली व्‍यक्ति ही योग्‍य हो तथा निर्धन तथा दुर्बल अयोग्‍य हो ।
- इसलिए समाज का यह मुख्‍य दायित्‍व है कि वह प्रत्‍येक व्‍यक्ति को पूर्ण अवसर दे ताकि वह अपने वातावरण के साथ अच्‍छे ढंग से व्‍यवहार कर सके ।
- इसलिए सामाजिक सेवाओं पर समुदाय के सभी वर्गों का समान अधिकार है । समुदाय का उत्‍तरदायित्‍व है कि वह बिना भेदभाव के अपने सभी सदस्‍यों की कठिनाइयों का निराकरण करें । बिना प्रजातांत्रिक भेदभाव के सम्‍पूर्ण सहयोग होना चाहिए ।
            - जन सहायता आवश्‍यकता की अवधारणा पर आधारित होनी चाहिए ।
- यदि किसी व्‍यक्ति/समूह/समुदाय को सुविधा दी जाती है तो उससे दूसरों के सुरक्षा को खतरा नहीं होना चाहिए ।
- केन्‍द्रीय सरकार का यह उत्‍तरदायित्‍व है कि वह स्‍वास्‍थ्‍य, आवास, पूर्ण रोजगार, शिक्षा तथा अन्‍य विविध प्रकार से जन कल्‍याण एवं सामाजिक बीमा योजना सम्‍बंधी कार्यक्रमों
 3. समाजकार्य की प्रणालियों एवं कार्यों के संदर्भ में –
-समाज कार्य का कार्यात्‍मक रूप द्विमुखी है यह दो प्रणालियाँ अपनाता है । इसके एक छोर पर वैयक्तिक सेवाकार्य है तो दूसरे छोर पर सामाजिक क्रिया । एक तर फ वह वैयक्तिक सेवा कार्य का प्रयोग कर वह व्‍यक्ति को सामाजिक ढाँचे में समायोजन करने के लिए सहायता करता है तो दूसरी तर फ वह सामाजिक क्रिया के द्वारा वह व्‍यक्ति के लिए सामाजिक ढाँचे को बदलता है जो समाज एवं व्‍यक्ति के अनुकूल हो । सामुदायिक संगठन, सामूहिक सेवा कार्य तृतीय शक्ति के रूप में इन दोनों ध्रुवों के बीच कार्य करते हैं ।
- यह प्रणालियों मानव व्‍यवहार का वैज्ञानिक पद्धति से अध्‍ययन करके उसके व्‍यवहार में सुधार द्वारा या सामाजिक विकास के लिये वातावरण के परिवर्तन एवं अन्‍तदृष्टि के विकास द्वारा समस्‍या का निराकरण करती है । यह आदेश, निर्णय एवं प्रबोधन में विश्‍वास नहीं करता है ।
-समाजकार्य जनतंत्र को एक प्रणाली के रूप में अपनाता है । समाजकार्य के एक महत्‍वपूर्ण घटक के रूप में जनतंत्र को अपनाया जाता है । समाजकार्य का यह दायित्‍व है कि वह प्रत्‍येक कार्य के दौरान प्रजातंत्र के मूल्‍यों को प्रयोग करे । व्‍यावसायिक सेवा कार्य में व्‍यक्ति का महत्‍व, समायोजन आत्‍म विकास तथा व्‍यक्‍त करने की क्षमता  होती है ।
- सार्वजनिक तथा निजी दोनों ही संस्‍थाओं में समाजकार्य सेवाएँ व्‍यावसायिक रूप से प्रशिक्षण प्राप्‍त व्‍यावसायिक कार्यवाहियों द्वारा ही प्रदान की जानी चाहिए ।

4. सामाजिक कुसमायोजन एवं सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में –
-हमारी संस्‍कृति में गम्‍भीर राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक कुसमायोजन है । यह कुसमायोजन को दूर करने हेतु एक नयी सामाजिक सोच की आवश्‍यकता है । जो सामाजिक वास्‍तविकता (Social Facts) तथा सामाजिक मूल्‍य (Social Values) में पुल का काम करें ।
-इस कुसमायोजन को दूर करने हेतु क्रमिक विकास द्वारा किया गया सुधार हमारे समाज के लिए प्रासंगिक एवं
वांछनीय है । ताकि हम बदली आवश्‍यकताओं तथा परिस्थितियों में समायोजित हो सकें ।
            -इसलिए सामाजिक नियोजन आवश्‍यक हैं ।
            इस प्रकार समाज कार्य मानव की  उसी रूप में गरिमा तथा सम्‍मान के साथ स्‍वीकार करता है तथा उसके असमायोजन सम्‍बंधी समस्‍याओं को दूर करने हेतु अपनी प्रविधियों को प्रयोग करता है । इस सम्‍पूर्ण प्रक्रिया में जनतंत्र तथा मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाया जाता है यही समाजकार्य दर्शन का सारतत्‍व है । लेकिन इन विचारों को व्‍यक्‍त करने वाला विद्वान पश्चिमी देश तथा मूल्‍यों के ज्‍यादा करीब है ।
            भारतीय समाज कार्य का एक अपना दर्शन है । जो भारतीय परिवेश में पुष्पित एवं पल्‍लवित हुआ है । भारत में समाज कार्य के विकास के साथ ही समाज कार्य दर्शनका विकास हुआ । पहले यहाँ गरीबों, असहायों तथा अपंगों की सहायता करना प्रत्‍येक व्‍यक्ति का कर्तव्‍य था । वैदिक काल में पुरोहित समाज कार्य करता था । उस समय दान, धर्मशाला सड़क आदि बनवाना दीन दुखियों की सेवा आदि कार्य किया जाता था क्‍योंकि सनातन धर्म भौतिक सहायता के साथ मानव सेवा का भी हिमायती है । वैदिक काल के बाद बौद्धकाल में ज्ञान दान, मठ निर्माण प्रमुख कार्य थे । तो 18वीं तथा 19वीं शताब्‍दी में जाति प्रथा, रूढि़याँ, विधवा विवाह तथा बाल विवाह एवं समाज के अन्‍य कुरीतियों के विरूद्ध  ब्रह्म समाज, आर्य समाज तथा रामकृष्‍ण मिशन ने अभियान चलाया किन्‍तु 20 वीं शताब्‍दी में गांधी जी ने समाज कार्य के दर्शन का प्रतिपादन निम्‍न प्रकार किया –
            - अपना तथा दूसरों का सम्‍मान करना चाहिए । जो कार्य आपको बुरा लगे वह दूसरों हेतु न करें ।
- मानव की प्रतिष्‍ठा को कायम करने हेतु स्‍वतंत्रता का संकल्‍प लिया ताकि आत्‍म सम्‍मान तथा प्रतिष्‍ठा दी जा सके ।
- गांधी ने आन्‍दोलन में जाति, धर्म सम्‍प्रदाय का भेदभाव नहीं किया ।
- वर्ग तथा जाति विहीन समाज की स्‍थापना ।
- गांधी जी का विचार था कि अपनी सहायता सबसे अच्‍छी सहायता है ।
- सक्रियता के लिए सहभागिता, आत्‍मानुशासन को जीवन की शैली माना ।
- सत्‍य अहिंसा व्‍यक्ति, समूह, समुदाय, विश्‍व के विकास का आधार है ।
- लक्ष्‍य प्राप्ति के साधन तथा साध्‍य दोनों पवित्र होने चाहिए ।
- सर्वोदय द्वारा सभी वर्गों एवं सभी क्षेत्रों का कल्‍याण ।
- दुर्बलों के कल्‍याण पर विशेष बल ।
- सादा जीवन उच्‍च विचार
- अपरिग्रह, ट्रस्‍टीशिप में विश्‍वास ।
- श्रम की महत्‍ता महत्त्वपूर्ण अंग है ।
- जीविकोपार्जन का अधिकार सभी को मिलना चाहिए ।
            संक्षेप में समाज कार्य का मूल दर्शन सभी देशों में समान रूप से प्रचलित है । लेकिन कुछ दार्शनिक तत्त्व ऐसे हैं जो कि सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्‍कृतिक दशाओं में भिन्‍नता से अलग अलग होते हैं । हालांकि मानव की गरिमा तथा उसके कुसमायोजन को दूर करने में प्रयास सभी जगह किया जाता है । लेकिन भारतीय सन्‍दर्भ में समाज कार्य का भारतीय दर्शन के तत्त्व पश्चिमी दार्शनिक तत्त्वों की अपेक्षा श्रेष्‍ठ हैं ।
समाजकार्य-दर्शन
            फ्राइडलैण्‍डर का विचार है कि समाजकार्य के मौलिक मूल्‍यों का जन्‍म स्‍वत: नहीं हुआ है बल्कि उनकी जड़ें उन गहरे, उपजाऊ विश्‍वासों में मिलती है जो सभ्‍यताओं को सींचते हैं । उनके अनुसार अमरीका की प्रजातांत्रिक सभ्‍यता का आधार नैतिक एवं अध्‍यात्मिक समानता, वैयक्तिक विकास की स्‍वतंत्रता,सुअवसरों के स्‍वतंत्र चुनाव, न्‍याय पूर्ण प्रतिस्‍पर्द्धा वैयक्तिक स्‍वतंत्रता की एक निश्चित मात्रा, भाषण, प्रकटन एवं संदेशवाहन की स्‍वतंत्रता, पारस्‍परिक प्रतिष्‍ठता और सर्वजन के अधिकारी की स्‍वीकृति पर है ।उनका कहना है कि प्रजातंत्र के यह आदर्श अभी तक पूर्णरूप से प्राप्‍त नहीं किये जा सके हैं और समाज कार्य इन्‍हीं आदर्शों की प्राप्ति का प्रयास कर रहा है ।
            वास्‍तव में समाज कार्य और प्रजातंत्र में बहुत कुछ समानता है । प्रजातंत्र के मौलिक आदर्श स्‍वतंत्रता, समानता और बन्‍धुत्‍व हैं । और यही समाज कार्य के भी मौलिक आदर्श हैं । जैसा कि हम आगे चलकर देखेंगे समाजकार्य के अभ्‍यास में हर समय इन आदर्शों को ध्‍यान में रखकर कार्य किया जाता है ।
            सेवार्थी को पूर्ण स्‍वतंत्रता दी जाती है कि वह अपने जीवन का मार्ग प्रदर्शन अपनी रूचि के अनुसार करे । उसे इस बात की भी स्‍वतंत्रता होती है कि वह सहायता या सेवा स्‍वीकृत करे या न करे ।
            सेवार्थी से समानता का व्‍यवहार किया जाता है चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो । उसकी मानवता का आदर करना समाज कार्यकर्ता का परमकर्तव्‍य है ।
            समाजकार्य विश्‍वबन्‍धुत्‍व में विश्‍वास रखता है और विभिन्‍न संस्‍कृतियों और सांस्‍कृतिक समूहों की ओर सहनशीलता और उदारता का दृष्टिकोण रखता है । समाजकार्य का उद्देश्‍य एक ऐसा विश्‍वबन्‍धुत्‍व स्‍थापित करना है जिसमें सामाजिक शोषण न हो और जिसमें व्‍यक्ति का मूल्‍य उसके आर्थिक स्‍तर से न लगाया जाय बल्कि उन गुणों से लगाया जाय जिनपर मानवता का आधार है ।


  आनंद श्री कृष्णन
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